एकादशी व्रत कथा

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2020/07/20

Yogini Ekadashi | कैसे योगिनी एकादशी के प्रभाव से कोढ़ मुक्त हुए यक्ष हेम ?

  पं. शम्भू झा       2020/07/20

Yogini Ekadashi vrat katha

Yogini Ekadashi:आषाढ मास के कृष्ण पक्षमें आनेवाली "योगिनी एकादशी" का महात्म्य ब्रह्मवैवर्त पुराण में भगवान्‌ श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर महाराज के संवाद में वर्णित है

एक बार युधिष्ठिर महाराज ने भगवान्‌ श्रीकृष्ण से पूछा, "हे भगवान ! आषाढ मास के कृष्ण पक्ष में आनेवाली एकादशी का संबोधन क्‍या है ? ''

भगवान्‌ श्रीकृष्ण ने कहा, "हे राजन्‌ ! इसको "योगिनी एकादशी" कहते है इसके पालनसे व्यक्ति गंभीर पापकर्म और भवसागर से मुक्ति पाता है।"

योगिनी एकादशी की कथा

“हे नृपश्रेष्ठ ! अब मैं एक सुंदर कथा कहता हूँ । अलकापुरी के राजा महाराज कुबेर भगवान् शिवजी के अनन्य भक्त थे । उनके यहाँ हेम नाम का यक्ष उनका माली था। हेम की पत्नी विशालाक्षी बहुत सुंदर थी और वह विशालाक्षी पर बहुत आसक्त था। हेम मानस सरोवर से सुंदर फूल इकट्ठा करके वह फुल प्रतिदिन कुबेर को देता था।

और कुबेर उन सुंदर फूलों का उपयोग शिवजी के उपासना हेतु करते थे। एक दिन हेम ने सुंदर फूल इकट्ठा किये, पर वह पत्नी के प्रेम के कारन वह उसदिन कुबेर को फूल देना भूल गया | 

फूलों के अभाव के कारण पूजा संपन्न न हो सकी। छह घंटे प्रतीक्षा के पश्चात कुबेर को अत्यंत क्रोध आया और उन्होंने अपने एक सैनिक को माली के पास भेजा। हेम माली के पास से लौटते ही कुबेर को उस सैनिक ने कहा, हेम माली घर में अपने पत्नी का संग कर रहा है !

ये सुनने के पश्चात कुबेर ने हेम माली को अपने पास लाने का आदेश दिया। अपनी भूलको जानकर हेम ने कुबेर के सामने आते ही साष्टांग प्रणाम करके हाथ  जोडे खडा रहा। 

क्रोधित कुबेर ने उसे कहा, "हे मूर्ख ! (धार्मिक) तत्त्वों का खंडन करने वाले महापापी व्यक्ति ! अपनी पत्नी के आसक्ति के कारण आज तुमने मेरे प्रिय  आराध्य महादेव जी का अपराध किया है। 

ये केवल तुम्हारे इंद्रियभोग के कारण हुआ है । इसलिए तुम्हे कोढ हो यह मै शाप देता हूँ, जिससे इसके आगे तुम अपनी पत्नी से हमेशा दूर रहोगे । मूर्ख ! फौरन इस जगह से निकल जाओ।"

कुबेर के इस श्रापसे हेम माली का अलकापुरी से पतन होकर इस मृत्यु लोक में जन्म हुआ। थोडे समय बाद उसे कोढ हो गया । उस दुख से वह परेशान रहने लगा। भूख, प्यास और परेशानी से व्याकुल होकर वह वन में चला गया और बहुत दिन उसने इसी तरह गुजारे।

दिनभर उसे सुख नही मिलता और रात को भी उसे निद्रा नही आती थी। इसी तरह उसने अनेक सर्दी-गर्मी के वर्ष निकाले। पिछले जन्म में शिवजी की उपासना में सहायता करने के कारण उसे अपने पिछले जन्म का स्मरण था और अनेक पापकार्यों में मग्न होते हुए भी उसकी चेतना शुद्ध और सावधान थी ।

भ्रमण करते - करते एक दिन वह मेरु पर्वत पर पहुँचा । वहाँ पर उसने महान तपस्वी मार्कण्डेय जी को देखा, जिनकी आयु ७ कल्प (ब्रह्माके दिन) है। उन्हे देखकर दूर से ही उसने अनेक बार साष्टांग प्रणाम किया।

तो दयावान, करुणावान मार्कण्डेय ऋषि ने उसे अपने समीप बुलाकार पुछा, "तुमने ऐसा कौनसा महापाप किया है जिससे तुम्हे यह रोग हुआ है ?"

ये सुनने के पश्चात हेम माली ने सभी वृत्तांत उन्हे कह सुनाया और उनसे पूछने लगा, "हे ऋषिवर ! गत जन्मों के कुछ पुण्य के उदय से आपके दर्शन मुझे हुए है। कृपा करके पापमुक्त होने के लिए कोई उपाय बताएँ |"

तभी मार्कण्डेय ऋषिने कहा, "हे माली ! आषाढ मास की कृष्ण पक्ष में जो
योगिनी एकादशी ( yogini ekadashi )आती है, उस व्रत का पालन तुम करो ! ऐसा करने से उस व्रत के प्रभाव से तुम सभी पापों से मुक्त हो जाओगे।"

यह सुनकर हेम माली ने उस योगिनी एकादशी व्रत ( yogini ekadashi vrat  ) का कठोरता से पालन किया और कोढमुक्त होकर अलकापुरी को लौट गया और अपनी पत्नी के साथ आनंद में रहने लगा।


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८८ हजार ब्राह्मणों को भोजन दान कराने का फल केवल इस एकादशी ( yogini ekadashi )के व्रत  के पालन से मिलता है । जो भी मनुष्य इस "योगिनी एकादशी व्रत कथा ( Yogini Ekadashi vrat katha )"का पाठ या श्रवण करता है वः सब  पापोंसे मुक्त होकर पुण्यवान व्यक्ति बन जाता है ।

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