एकादशी व्रत कथा

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2020/07/15

Vijaya Ekadashi | स्वयं भगवान् राम ने किया था विजया एकादशी का व्रत

  पं. शम्भू झा       2020/07/15


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Vijaya Ekadashi : स्कंद पुराण में इस "विजया एकादशी" के महिमा का वर्णन किया गया है ।


महाराज युधिष्ठिर ने पूछा, "हे वासुदेव ! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्षमें कौनसी एकादशी आती है ? कृपया आप मुझे बताईये ।"

भगवान श्रीकृष्णने कहा, "हे युधिष्ठिर ! एक बार कमलपर विराजमान ब्रह्मा जी को नारद जी ने पूछा, हे सुरश्रेष्ठ ! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में विजया एकादशी आती है । उसका पालन करने से कौन सा पुण्य प्राप्त होता है इसके बारे में आप मुझे बताइये ।"


विजया एकादशी व्रत कथा

ब्रह्मदेव ने कहा, "हे नारद ! सुनो, में तुम्हे विजया एकादशी व्रत कथा सुनाता हुँ, जो सब पापोंका हरण करनेवाली है । यह व्रत बहुत प्राचीन और पवित्र है। यह विजया एकादशी राजाओं को विजय प्रदान करनेवाली है ।

बहुत पहले जब राजा रामचंद्र १४ वर्षों के लिए वन में गए थे, तो पंचवटी में सीता और लक्ष्मण के साथ निवास कर रहे थे । वहाँसे रावणने सीताहरण किया। इस दुखसे उन्हें व्याकुलता हुई ।

सीताजी की तलाश में वन-वन भटकते हुए उन्हे जटायु मिला जो मरणासन्न था । उसके पश्चात उन्होंने वनमें कबन्ध राक्षस का वध किया । सुग्रीवसे मित्रता करके श्रीरामचन्द्रजीने वानरसेना को संगठित किया । हनुमानजी श्रीरामचन्द्रजी की मुद्रा लेकर लंका गए और सीताजी की तलाश करके लौट आए ।

वहाँ से लौटते ही लंका कथन के पश्चात सुग्रीवसे अनुमति लेकर श्रीरामचन्द्र जी ने लंका जाना निश्चित किया | सागरतीर आनेपर वे लक्ष्मणसे कहने लगे, "हे सुमित्रानंदन ! इस अगाध सागर में अनेक भयानक जीव जंतु है । इसे सुगमता से कैसे पार करे, कोई भी उपाय सूझ नही रहा | 

लक्ष्मण ने कहा, “महाराज ! आप ही आदिदेव और पुराण पुरूष पुरूषोत्तम है। आपसे  कुछ भी छिपाना असंभव है । इस द्वीप में प्राचीन काल से बकदाल्भ्य मुनि रहते है । पास में ही उनका आश्रम है । हे रघुनन्दन ! उन्हें इस समस्या का समाधान पूछते है ।"

लक्ष्मण के कथनानुसार प्रभु रामचंद्रजी मुनिवर्य बकदाल्भ्य के पास मिलने उनके आश्रम गए उन्हें सादर प्रणाम किया । तब मुनिवर्य ने पहचाना कि यही परमपुरूषोत्तम श्रीराम है । अत्यंत आनंदपूर्वक उन्होंने पूछा, ' श्रीराम, आपका आगमन किस हेतु हुआ ? |

रामचंद्रजी ने कहा, ' हे मुनिवर्य ! रावण का संहार करने मै यहाँ आया हूँ । कृपा करके यह सागर पार करनेका उपाय बताएँ ।

बकदाल्भ्यजीने कहा, "हे श्रीराम ! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की “विजया एकादशी व्रत" के पालन से विजय मिलता है । हे राजन ! इस व्रत की विधि इस प्रकार है ।

विजया एकादशी विधि  

दशमी के दिन सोने, चांदी, पीतल, तांबा अथवा मिट्टी के एक कलश की स्थापना करे । उसमें पानी भरके पत्ते डाले । उसपर भगवान्‌ नारायण के सुवर्णमय विग्रहकी स्थापना करे ।

एकादशी के दिन प्रात:काल उठकर स्नान करे । उसके बाद पुष्पमाला, चंदन, सुपारी, नारियल अर्पण करके उस कलश की पूजा करनी चाहिए । दिनभर कलश के सामने बैठकर विजया एकादशी व्रत कथा  का पाठ करना चाहिए, साथ ही रात्रि के समय जागरण भी करना चाहिए । घी का दीपक जलानेसे व्रत की अखंड सिद्धी प्राप्त होती है ।

उसके पश्चात द्वादशी के दिन नदी या तालाब के किनारे उस कलशकी विधिवत पूजा करके वो कलश ब्राह्मण को दान करना चाहिए । महाराज ! कलश के साथ और भी बडे बडे दान करने चाहिए। हे श्रीराम ! आप इस व्रत का पालन कीजिए, इससे आपको विजय प्राप्त होगी ।"

ब्रह्माजी कहने लगे, “हे नारद ! मुनिवर्य के कहेनुसार प्रभु श्रीरामचंद्रजी ने विजया एकादशी का व्रत किया । उस व्रत के प्रभाव से श्रीरामचंद्रजी विजयी हुए । हे पुत्र ! इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य को इस जीवन में विजय प्राप्त होता है और अक्षय परलोक प्राप्त होता है !"

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भगवान्‌ श्रीकृष्ण ने कहा, "इस विजया एकादशी का पालन करना चाहिए! तथा विजया एकादशी व्रत कथा का महात्म्य सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है ।''
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