एकादशी व्रत कथा

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2020/07/18

Varuthini Ekadashi | जीवन में सौभाग्य की वृद्धि करता है वरूथिनी एकादशी

  पं. शम्भू झा       2020/07/18
Varuthini Ekadashi

Varuthini Ekadashi: वैशाख मास के कृष्ण पक्ष में आनेवाली "वरुथिनी एकादशी" का महात्म्य भविष्योत्तर पुराण में श्रीकृष्ण और महाराज युधिष्ठिर के संवाद में कहा गया है।

एक बार युधिष्ठिर महाराज ने भगवान्‌ श्रीकृष्ण से पूछा, "हे वासुदेव ! वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम क्या है ? और इस एकादशी व्रत का पालन करनेसे क्या फल प्राप्त होता है और उसका महात्म्य क्या है ?"

भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा, "हे प्रिय राजन्‌ ! इस एकादशी का नाम "वरुथिनी" है जिसको करने से इस जन्म और अगले जन्म में भी सौभाग्य प्राप्त होता है। 

इस एकादशी व्रत के प्रभाव से व्यक्ति सभी पापों से मुक्त होता है, साथ ही उसे वास्तविक आनंद की प्राप्ति होकर वह भाग्यवान बनता है। और जन्म-मरण के चक्र से छुटकारा मिलकर उसे भगवान की भक्ति प्राप्त होती है।

इस व्रत के पालन से "मान्धाता" राजा को मुक्ति मिली। उसी प्रकार अनेक राजा महाराजा जैसे की महाराज "धुन्धुमार" भी मुक्त हुए। केवल वरुथिनी एकादशी के व्रत से दस हजार वर्ष तपस्या का फल प्राप्त होता है। तथा सूर्य ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र पर ४० किलो सुवर्ण दान का फल इस व्रत  को करनेसे मिलता है।"

"हे राजन्‌ ! गजदान, अश्वदान से श्रेष्ठ है, भूमिदान, गजदान से श्रेष्ठ माना जाता है और तिलदान, भूमिदान से भी श्रेष्ठ है। सुवर्णदान,  तिलदान से श्रेष्ठ है तथा अन्नदान, सुवर्ण दान से भी श्रेष्ठ है। हे राजन् ‌! अन्नदान करने से पूर्वज, देवता और सभी प्राणी प्रसन्न होते है। बुद्धिमान लोंगो का यह विचार है कि, कन्यादान भी अन्नदान इतना ही पुण्य कार्य है। 

स्वयं भगवान्‌ कहते है कि, "अन्नदान, गोदान के  जितना  ही श्रेष्ठ है।  परंतु सर्वश्रेष्ठ विद्यादान ही है।"

केवल वरुथिनी एकादशी व्रत के पालन से सभी प्रकार के दान देने जैसा पुण्य प्राप्त होता है। अपने चरितार्थ के लिए जो अपनी कन्या को बेचता है वो सबसे नीच मनुष्य माना जाता है और प्रलय तक उस व्यक्ति को नरक में दुःख भोगना पडता है। 

इसलिए किसी को भी अपनी कन्या के बदले में कभी धन स्वीकार नही करना चाहिए। और जो व्यक्ति ऐसा करता है उसे अगला जन्म बिल्ली का मिलता है।

परंतु अपनी क्षमता से जो व्यक्ती सुवर्णालंकार से सुशोभित करके योग्य वर को अपनी कन्या प्रदान करता है उस व्यक्ति के पुण्यों का लेखाजोखा यमराज के सचिव चित्रगुप्त भी नही कर सकते।

इस एकादशी के व्रत का पालन करनेवालों को
कुछ बाते वर्जित है वह है :
-
  • कांसे के बर्तन में न खाऐँ।
  • मांसाहार न करें।
  • मसूर की दाल, हरी सब्जियाँ, मटर ना खाऐं।
  • अभकक्‍त के हाथ का बनाया हुआ न खाऐँ।
  • दशमी, एकादशी दिन मैथुन वर्जित है।
  • जुआ ना खेलें।
  • पान न खाऐँ।
  • दांत की सफाई न करे ।
  • (दंतमजन करना वर्जित है) प्रजल्प न करे ।
  • झूठ ना बोलें।
  • किसीकी भी निंदा न करे।
  • पापी व्यक्तिसे बात न करे।
  • दिन में न सोये।
  • किसी पर भी क्रोध ना करे।
  • शहद न खायें।
  • दशमी ,एकादशी और द्वादशी के दिन नाखून,
    बाल ना काटे ।
  • दाढी भी न करे।
  • दशमी, एकादशी और द्वादशी के दिन शरीर को तेल न लगाऐँ।

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सावधानी पूर्वक इन सब बातों का पालन करनेसे उत्तम प्रकार से (Varuthini Ekadashi)  एकादशी व्रत  का पालन होता है और पालन करनेवाले को जीवन के सर्वोच्च ध्येय की प्राप्ति होती है।

वरूथिनी एकादशी के दिन जागरण करने से सभी पाप क्षय हो जाते है और उसे भगवद्धाम की प्राप्ति होती है। इस एकादशी "varuthini ekadashi"  की महिमा को जो कोई भी सुनता है अथवा पढता है उसे एक सहस्र गोदान का पुण्य मिलता है और वह भगवान्‌ विष्णु के धाम की प्राप्ति करता
है।
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