एकादशी व्रत कथा

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2020/07/16

Papmochani Ekadashi | क्या हुआ जब मेधावी ने मंजुघोषा अप्सरा को दिया श्राप

  पं. शम्भू झा       2020/07/16

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Papmochani Ekadashi: भविष्योत्तर पुराणमें भगवान्‌ श्रीकृष्ण और महाराज युधिष्ठिर के संवादों में पापमोचनी एकादशी का वर्णन आता है ।

एक बार युधिष्ठिर महाराज भगवान्‌ श्रीकृष्ण को कहने लगे, "हे केशव ! आमलकी एकादशी के वर्णन के पश्चात चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में आनेवाली पापमोचनी एकादशी व्रत कथा का कृपया कथन करें ।


भगवान्‌ श्रीकृष्ण ने कहा, “हे राजन! बहुत वर्ष पहले लोमश ऋषिने राजा मान्धाता को इस पापमोचनी एकादशी की महिमा सुनायी थी। इस एकादशी व्रत के पालन से मनुष्य सब पापोंसे मुक्त होता है और जीवन के अनेक प्रकारके बुरे अनुभव से मुक्त होकर अष्टसिद्धी प्राप्त करता है।

लोमश ऋषीने कहा, "बहुत पहले देवाताओं का कोषाध्यक्ष कुबेर का अतिशय सुंदर "चैतरथ" नाम एक मनोहर उपवन था। विशेष करके पूरे वर्षभर बसंत ऋतु के जैसा उस उपवन का वातावरण था।

 इसीलिए स्वर्गकन्या, किन्नर, अप्सरा और गंधर्व हमेशा विहार के लिए वहाँ आते थे। विशेष करके देवेंद्र और अन्य देवता भी वहाँ आकर आनंद और प्रेमका आदान-प्रदान करथे थे ।

उसी उपवनमें शिवजी के परमभक्‍त मेधावी नामक ऋषि तपस्या करते थे जिनकी तपस्या अनेक प्रकारसे भंग करने का प्रयत्न स्वर्गकी अप्सराएँ करती रहती थी । एक बार मंजुघोषा अप्सरा ने उनका तपोभंग करनेका निश्चय किया । 

उसने ऋषि के आश्रम के समीप ही कुटिया बांधी और बहुत ही मधुर स्वरमें गाना गाने लगी । उसी समय शिवजी का शत्रु कामदेव भी शिवभक्‍त मेधावी ऋषि को जीतने का प्रयत्न करने लगे ।

शिवजीने कामदेव को एकबार भस्म किया था उसीका प्रतिशोध लेने के लिए कामदेवने ऋषिके शरीरमें प्रवेश किया । शुभ्र उपबीत धारण किए हुए मेधावी ऋषि च्यवन महर्षी के आश्रम में वास करते थे । 

कामदेव के शरीर में प्रवेश से मेधावी ऋषि भी कामदेव जैसे ही सुंदर दिखने लगे । उसी वक्‍त कामासक्त मंजुघोषा उनके सामने आई । मेधावी ऋषि भी काम से घायल हो गए । 

उन्हे शिवजी की उपासना का विस्मरण हुआ और स्त्री संग मे पूरी तरह मग्न रहे । स्त्री -संग में उन्हे दिन-रात का भी विस्मरण हो गया। इस प्रकार अनेक वर्ष मेधावी ऋषीने काम क्रीडामें बिताए।

उसके पश्चात मंजुघोषा ने जाना कि मेधावी ऋषिका पतन हो चुका है और उसे अब स्वर्ग लौटना चाहिए । प्रणय में मगन ऋषी को वह कहने लगी, "हे ऋषीवर ! कृपया मुझे स्वर्गलोक में लौटने की अनुमति दीजिए ।"

उसपर मेधावी ऋषीने उत्तर दिया, "हे सुंदरी ! आज संध्या को तुम मेरे पास आयी हो, आज रात यहाँ पर रहकर सुबह तुम लौट जाना। मंजुघोषा इस तरह और कुछ वर्ष वहाँ रही जो ५७ वर्ष ९ महिने ३ दिन का काल था, परंतु ऋषि के लिए यह काल केवल अर्धरात्रि समान था ।

पुनः स्वर्ग जाने की अनुमति लेनेपर ऋषि ने कहा, "हे सुंदरी ! अब प्रात: हो रही है, मेरी प्रात:विधी के पश्चात तुम जाना । तभी अप्सरा हंसते हुए कहने लगी, "हे ऋषिवर ! प्रात:विधी को आपको कितना समय लगेगा ? अभी तक आपको तृप्ति नही आई ? मेरे संग में आपने कितने वर्ष गुजारे है? इसलिए कृपया समय का ध्यान करें ।

ये शब्द सुनते ही मेधावी ऋषीने वर्षोकी गणना की और कहा, "अरे ! हे सुंदरी ! मैने अपने जीवनके ५७ वर्ष व्यर्थ गवा दिए । तुमने मेरे जीवन और तपस्या इन दोनों का नाश किया है। ऋषी के आँखोमें आंसू आए और उन्होंने मंजुघोषा को शाप दिया,

 हे दुष्टे ! तुम्हे धिक्कार है ! तुमने मेरे साथ चुडैल जैसा व्यवहार किया है, इसलिए तुम चुडेल बनो।

ऋषीसे शाप मिलने के बाद मंजुघोषा ने कहा, "हे द्विजवर ! कृपया ये कठोर शाप आप वापस लीजीए । आप बहुत समय हमारे साथ रहे । हे स्वामी ! कृपा दया कीजिए !

इसपर मेधावी ऋषी कहने लगे, "हे देवी ! मै अब क्या करूँ ? तुमने मेरी तपोशक्ति तथा तपोधन का नाश किया है । फिर  भी इस शाप से मुक्त होने का उपाय सुनो । चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में जो. पापमोचनी एकादशी आती है उस दिन इस एकादशी व्रत का कठोर पालन करने से इस चुड़ैल योनी से तुम्हे मुक्ति मिलेगी।

इतना कहकर मेधावी ऋषी अपने पिता च्यवन ऋषिकें आश्रम लौट आए । अपने पतित पुत्रको देखकर च्यवन ऋषीकों बहुत दुःख हुआ। वे कहने लगे, "हे पुत्र ! तुमने ये क्या किया? एक स्त्री के लिए अपनी तपस्या नष्ट की। अपना ही नाश कर लिया?

उसपर मेधावी ऋषीने कहा, "मैंने दुर्भाग्यसे एक अप्सरा का संग करके बहुत बडा पातक किया । कृपा करके इस पापका योग्य प्रायश्चित बताएँ । पश्चाताप दग्ध पुत्र के शब्द सुनने के बाद च्यवन महर्षी ने कहा, " चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की पापमोचनी एकादशी के व्रत पालन से तुम पापामुक्त हो जाओगे।

उसके बाद बड़े उत्साह और कठोरतासे मेधावी ऋषी ने पापमोचनी एकादशी व्रत कथा का पालन किया जिसके प्रभावसे वे सभी पापोंसे मुक्त हुए । मंजुघोष को भी इस व्रत के पालन करने से अपने पूर्वरूप की प्राप्ति हो गई जिससे वह स्वर्गलोक चली गईं ।

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यह कथा कहने के पश्चात लोमश ऋषीने मान्धाता राजाको कहा, हे प्रिय राजन ! केवल इस व्रत पालन से सभी पाप नष्ट हो जाते है। इस Papmochani Ekadashi Vrat Katha के महात्म्य पढनेसे अथवा सुननेसे हजार गाय दान करनेका पुण्य प्राप्त होता है । 

इस पापमोचनी एकादशी (papmochani ekadashi) का पालन करने से अनेक पापों से जैसे कि भ्रुणहत्या, ब्रह्महत्या, मद्यपान, परस्त्रीसंग, गुरुपत्नी संग इनका नाश हो जाता है।
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