एकादशी व्रत कथा

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2020/07/15

Ekadashi Mahatmya | एकादशी के दिन अन्न ग्रहण क्यों नहीं करना चाहिए?

  पं. शम्भू झा       2020/07/15
Ekadashi Mahatmya



 Ekadashi Mahatmya:श्रीलव्यासदेवजी ने पुराणों में एकादशी व्रत का माहात्म्य अनेक स्थानों पर किया है । इस ब्लॉग में हर "एकादशी महात्म्य" का वर्णन कथारूप में किया गया है । 


एकादशी महात्म्य

कथा पढने के बाद किसी को ऐसा प्रतीत हो कि इस पालन से भौतिक लाभ होता है, इसलिए यह व्रत केवल भौतिक लाभहेतु हो । किंतु वेसा नही है, जो वैष्णव है, उनके लिए यह सर्वश्रेष्ठ व्रत है। एकादशी भगवान्‌ श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय है, इसलिए उसको हरिवासर कहते है।

उपवास इस शब्द अर्थ है पास रहना । हमें अगर भगवान के निकट रहना है, तो यदि आप अपने जीवन में इश्वर की प्राप्ति चाहते हैं तो,उपवास करना आवश्यक है । इसीलिए एकादशी के दिन सभी भौतिक इंद्रियतृप्ती के कार्य से दूर रहकर भगवान के नामस्मरण में अधिक-से-अधिक समय बिताना चाहिए ।

ब्रह्मवैर्वत पुराणमें कहा गया है कि-


उपावृत्तस्थ पापेभ्यो,
 यस्तु वासो गुणैः सह ।

उपवास: स विज्ञेय:,
 सर्व भोग विवर्जित: ।॥।

उपवास का मतलब सभी पापों से और इंद्रियतृप्ति के कार्यो  से दूर रहना।  निश्चित ही एकादशी व्रत के पालन से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इनकी प्राप्ति तो होती है, पर उसके साथ पंचम पुरूषार्थ भगवद्भक्ति अथवा कृष्ण प्रेम भी प्राप्त होता है ।

श्री हरिभक्ती विलास नामक ग्रंथमें बताया गया है कि,


एकादशी व्रतं नाम,
सर्व काम फल प्रदम ।

कर्तव्यं सर्वदा विप्रै:,
 विष्णु प्रीणनकारणम्‌ ।।

भगवान्‌ श्रीविष्णु की प्रसन्‍नता के लिए ब्राह्मणों को एकादशी व्रत का पालन करना चाहिए । यह उनका कर्तव्य है । इसीलिए हर एक व्यक्ति को भगवान्‌ की प्रसन्‍नता के लिए इस व्रत का पालन करना चाहिए। भगवान श्रीविष्णु प्रसन्‍न होने से सुख और समृद्धि अपने आप प्राप्त होती है । 

विष्णुपाद नित्यलीला प्रविष्ट "सच्चिदानंद भक्तिविनोद ठाकुर" अपने एक गीत में लिखते है-


माधव तिथी भक्ति जननी जनते पालन करी ।

माधव तिथी अर्थात एकादशी, जन्माष्टमी व्रत, भक्तिजननी का मतलब हमारे हृदयमें भक्ति निर्माण करनेवाली है। इसलिए वे कहते है कि, हमे प्रयत्नपूर्वक उसका पालन करना चाहिए ।


संत शिरोमणी "श्री तुकाराम महाराज जी महराज" कहते हैं,

ज्यासी नावडे एकादशी । तो जिताची नरकवासी
ज्यासी नाबडे हे व्रत । त्यासी नरक तोहि भीत
ज्यासी घडे एकादशी । जाणे छागे विष्णुपाशी
तुका म्हणे पुण्ययाशी । तोचि करी एकादशी

जिसे यह एकादशी अच्छी नही लगती, वो जीते जी नरक में रहनेवाला व्यक्ति है । जिसे यह व्रत पसंद नही उससे नरक भी डरते है । क्योंकि वह व्यक्ति महापापी माना जाता है । जो एकादशी व्रत का पालन करता है, उसे निश्चित वैकुंठ की प्राप्ती होती है ।


इसीलिए तुकाराम महाराज कहते है, "जिसने पूर्वजन्मों में पुण्यों की राशियाँ इकट्ठी की है, वे ही केवल एकादशी व्रत का पालन करते है ।"


एकादशी को अन्नग्रहण करने से क्या होता है?  इसका वर्णन तुकाराम महाराज इस प्रकार करते है,


एकादशीस अन्नपान । जे नर करिती भोजन
श्वान वि्ेसमान । अधम जन ते एक
तया देही यमदूत । जाले तयाचे अंकित
तुका म्हणे व्रत । एकादशी चुकलिया

जो लोग एकादशी को अन्नग्रहण करते है, भोजन करते है वह बहुत ही पतित जीव है । उन्हें अधम माना जाता है, क्योंकि वे जो भोजन करते है वह शवान की विष्ठा जैसा होता है । जो यह व्रत नही करता, उसके लिए यमदूत हैं ही, वो नरक गामी बनता है।



एकादशी के दिन अन्न क्यों नहीं ग्रहण करना चाहिए?

एकादशी के दिन पापपुरूष अन्नमें वास करता है, इसलिए अन्नग्रहण नही करना चाहिए । जिसे अपना हित करना हो उसे निम्नलिखित अन्न का एकादशी के दिन त्याग करना चाहिए ।
  1. चावल, तथा उससे बने पदार्थ, 
  2. गेहुँ, ज्वार, मक्का इनसे बने हुए पदार्थ,
  3. दाल-मूंग, मसूर, तूर, चना, मटर इत्यादि, जव, 
  4. राई और तिलका तेल.
भूलसे भी इन पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए ।अन्यथा व्रत भंग होता है। भक्ति में प्रगति करने के इच्छुक व्यक्ति को इनका पालन करना चाहिए ।एक ही दिन दो तिथि आती हो तो वैष्णव उस दिनका व्रत अथवा उत्सव दूसरे दिन करते है।इसलिए हम स्मार्त और भागवत यह दो एकादशी देखते हैं ।

हरिभक्ती विल्लास इस ग्रंथमें कहा गया है,

इसे भी पढ़ें :  



"हे ब्राह्मण, सूर्योदय से पूर्व ९६ मिनट के पहिले एकादशी शुरू होती है उस एकादशी को शुद्ध एकादशी कहना चाहिए । गृहस्थों को इस एकादशी का पालन तथा एकादशी महात्म्य का पाठ करना चाहिए । एकादशी करने वाले या करने की इच्छा होनेवाले हर एक व्यक्ति को इस Ekadashi Mahatmya को ध्यान पूर्वक पढना चाहिए ।
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